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पार्टी के सभी बड़े नेता जो अखिलेश के खिलाफ थे, वो या तो मैदान से बाहर हैं या अखिलेश के पीछे खड़े हैं। समाजवादी पार्टी में अब एक नेता, एक निशान। पांच साल तक लाचार सीएम होने के विपक्ष के ताने झेलने वाले अखिलेश यादव का यह अभ्युदय ऐतिहासिक है। समाजवादी पार्टी का अखिलेश युग शुरू हो गया है। साइकल भी उनकी और पार्टी भी।

4 अक्टूबर 1992 को जब मुलायम सिंह ने समाजवादी पार्टी बनाई थी। तब मुलायम की छवि गांव और किसानों की बात कहने वाले एक यादव नेता की थी। चौधरी चरण सिंह की छाप उन पर साफ नजर आती थी। बाद में बाबरी मस्जिद प्रकरण के बाद उनका दायरा मुसलमानों में खूब बढ़ा।साल 2011 में मुलायम ने अखिलेश यादव को आगे बढ़ाया और इसी के साथ एसपी को आधुनिक लुक देने की शुरुआत हुई। बदलाव के इस दौर में मुलायम और अखिलेश के बीच जेनरेशन गैप भी देखने को मिला।

इन पांच सालों में समाजवादी पार्टी के परंपरागत ग्रामीण चेहरे को अखिलेश आधुनिक लुक देने में कामयाब रहे। पार्टी को युवाओं से जोड़ने की कोशिश में भी वह काफी हद तक कामयाब रहे हैं। इस चुनाव में 54 फीसदी वोटर 18 से 39 साल तक के हैं। अखिलेश की नजर शायद इन पर ही है। बतौर सीएम भी उन्होंने मेट्रो और एक्सप्रेस-वे जैसे बड़े बड़े प्रॉजेक्ट शुरू कर अपनी छवि को पूर्ण रूप से विकासवादी स्थापित कर दिया है।

मुलायम सिंह ने जब समाजवादी पार्टी बनाई थी तब उनके साथ जनेश्वर मिश्र, मोहन सिंह, आजम खां, बेनी प्रसाद वर्मा और भगवती सिंह जैसे कई सीनियर नेता थे। ये सभी जमीनी नेता थे जो संघर्ष की देन थे। ये सभी मुलायम का थिंक टैंक भी थे। अखिलेश के लिए इस तरह के जमीनी और समझदार नेताओं को जोड़ना जरूरी है। विवाद के बाद पार्टी में कई धड़े बन चुके हैं। इनको साथ लाना और इनसे निपटना पहली चुनौती है। लेकिन अखिलेश यादव की असीम लोकप्रियता देखते हुए किसी को इस बात का संदेह नहीं है की यह नए युग की समाजवादी पार्टी एक जुट हो कर आगे बढ़ेगी।

समाजवादी पार्टी का कोर वोट मुसलमान और यादव रहे हैं। इसके अलावा कई दूसरी ओबीसी जातियां और क्षत्रिय भी एसपी से जुड़कर विनिंग कॉम्बिनेशन बनाते रहे हैं, ये समीकरण बनाए रखना भी एक चुनौती होगी। मुलायम सिंह यादव की धरतीपुत्र की छवि भी अखिलेश यादव को अपनानी होगी। मुलायम जैसे रिश्ते निभाने का माद्दा रखना भी महत्वपूर्ण होगा। कहा जाता है कि पिता यदि पुत्र से हार भी जाए तो भी जीत उसी की मानी जाती है। पुत्र की जीत में ही उसे सुख मिलता है। संभव है कि अखिलेश को ‘नेताजी’ के रूप में देख मुलायम को अपना अक्स नजर आए जो कि स्वाभाविक भी है।