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उत्तर प्रदेश के आगरा के मलपुरा के छोटे से गांव सहारा में दंगल की गीता-बबिता की कहानी जीवंत हो जाती है। पूरे आगरा में ये बेटियां सोलंकी सिस्टर्स के नाम से मशहूर हैं। महावीर सिंह फोगट की तरह ही इन बेटियों के रियल हीरो इनके पिता विशंभर सिंह सोलंकी हैं। सोलंकी ने भी गांव के लोगों के विरोध और परेशानियों के बावजूद अपनी बेटियों का साथ दिया और इन्हें पहलवान बनाया। गांव वालों के कड़े रूख और समाज में लोक-लज्जा के डर से पिता ने घर में ही कुश्ती का अखाड़ा बना दिया और अपनी बेटियों को कुश्ती के दांव सिखाया। विशंभर सोलंकी खुद पहलवान रह चुके हैं।

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विशंभर की सात बेटियों में से सीमा सोलंकी, नीलम और पूनम सोलंकी पहलवानी में राष्ट्रीय स्तर तक अपना लोहा भी मनवा चुकी हैं। वैसे आगरा में ये सातों बहनें ‘सोलंकी सिस्टर्स’ के नाम से भी मशहूर हैं। आगरा की पहलवान बेटियां प्रदेश और देश का नाम रोशन करना चाहती हैं। ये बेटियां प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक पदक जीत चुकी हैं और ओलंपिक में गोल्ड जीतने के सपने से लगातार मेहनत कर रही हैं। विशंभर सोलंकी भी चाहते हैं कि उनकी बेटियां ओलंपिक में पदक जीतकर देश का नाम रोशन करें।

विशंभर सोलंकी को अपने बेटियों को पहलवान बनाने में काफी संघर्ष करना पड़ा था। किराने की दुकान से विशम्भर सोलंकी ने अपनी बेटियों की रियाज और उनके खाने का खर्च निकालते थे। उनकी ये कहानी महिलाओं को सशक्त और किसी से कम नहीं समझने के लिए बहुत ही प्रेरणादायी है।