जिस वक़्त लोहिया पार्क में रहता है 41 डिग्री तापमान, 51 डिग्री सेल्सियस की गर्मी से झुलसा रहा होता है कंकरीट वाला अम्बेडकर पार्क

चिलचिलाती गर्मी में आम आदमी तो बस ये चाहता है कि किसी हरे भरे पार्क में दो पल आराम से बैठे। पर पिछली सरकारों की अदूरदर्शी सोच ने शहरों में तापमान को बढ़ाने के अलावा कुछ नहीं किया। लखनऊ की बात करें तो पिछली सरकार ने यहां बेतहाशा पैसे बहाकर कंकरीट के पार्क बना दिए, जिसमें गर्मी के दिनों में राहत की उम्मीद तो दूर वहां पैर रखने से भी लोग कतराते हैं। इसके विपरीत लोहिया पार्क और जनेश्वर मिश्र पार्क की हरियाली लोगों को भा रही है। जिसे इलाके में ये पार्क हैं वहां के तापमान को भी कम करने में योगदान दे रहे हैं।


दरअसल किसी भी सरकार की नीतियां और कार्यक्रम तभी सफल माने जा सकते हैं जब वे लंबे समय तक फायदे पहुंचाएं। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश के विकास का खाका तैयार करने में इस बात को बखूबी ध्यान में रखा। बात चाहे पूरे प्रदेश में पौधे लगाने की हो, हरे-भरे पार्कों तैयार करने की हो, साइकिल ट्रैक्स के निर्माण की या फिर ई-रिक्शा को बढ़ावा देने की, निश्चित तौर पर ये कदम आने वाले समय में पर्यावरण संरक्षण में मील का पत्थर साबित होंगे। पौधे लगाने में तो अखिलेश सरकार वैसे भी अपना नाम गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स  में दर्ज करा चुकी है। तो अपने दूरगामी सोच से ही मुख्यमंत्री अखिलेश ने सूखे से अरसे से जूझ रहे बुंदेलखंड में तालाबों को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया है।

बात राजधानी लखनऊ में गर्मी की करें तो पिछले एक हफ्ते से यहां अधिकतम तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के आसपास दर्ज किया जा रहा है। बुधवार को समाचार पत्र नवभारत टाइम्स ने गर्मी की पड़ताल की तो पता चला कि अंबेडकर पार्क के सामने से गुजरने पर आग की लपटों सी महसूस होती है तो वहीं लोहिया पार्क वाला रास्ता सुकून देता है। जिस वक्त अंबेडकर पार्क में तापमान 51 डिग्री था, ठीक उसी वक्त लोहिया पार्क में तापमान 41 डिग्री सेल्सियस। वजह साफ है, एक पार्क को बनाने में हरियाली के कोई ख्याल न रखकर सिर्फ पत्थरों के बुत बनाए गए तो दूसरे में सिर्फ हरियाली को महत्व दिया गया। विशेषज्ञ कहते हैं कि पेड़ ज्यादातर धूप को सोख लेते है। इससे पेड़ों वाले इलाकों में गर्मी का असर कम होता है, बल्कि कंकरीट के पार्क गर्मी बढ़ाने में ही योगदान देते है।