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80 और 90 के दशक में एक नारा काफी बुलंद हुआ था ‘जिसका जलवा कायम है, उसका नाम मुलायम है। इस नारे का इस्तेमाल समाजवादी पार्टी के समर्थकों खूब किया। यहां तक कि कुछ महीनों पहले भी इस नारे का इस्तेमाल पार्टी समर्थक कर रहे थे, लेकिन अब इस नारे के बोल थोड़े बदल गए हैं। जिसके साथ बदल गए हैं उस नारे के मायने। ये ऐसा नारा है, जिसमें अखिलेश का नाम ना होते हुए भी अखिलेश को समर्थित है।

अखिलेश की राजनीति करने का तरीका थोड़ा अलग है। वो मॉर्डन एरा में यूपी की राजनीति में बदलाव लाने की कोशिश कर रहे हैं। प्रदेश में जाति और धर्म के नाम पर होने वाली राजनीति से ऊपर उठकर विकास की राजनीति को लेकर आए हैं। उन्हीं मुद्दों पर चुनाव लड़ रहे हैं। संप्रदायिक ताकतों के खिलाफ सभी पार्टियों को एकत्र कर उनके खिलाफ चुनाव लड़ने  की कोशिश कर रहे हैं। जिसमें वो सफल होते भी दिखाई दे रहे हैं। ये सिर्फ समाजवादी पार्टी के लिए ही नहीं है बल्कि यूपी की राजनीति और यहां के रहने वाले लोगों से भी बेहतर है। देश में अखिलेश जनता को एक ऐसा ऑप्शन देना चाहते हैं कि केंद्रीय राजनीति में भी थोड़ा बदलाव हो सके।

लोगों मानें तो नए युग के अखिलेश के नेतृत्व के तरीके काफी फर्क हैं। पुराने विचार के नेता जातियों और धर्म विशेष की राजनीति करने में विश्वास रखते हैं, जबकि अखिलेश की सोच इसके विपरीत है। अखिलेश यादव सर्वमान्य नेता के तौर पर अपनी पहचान बनाना चाहते हैं।

समाजवादी पार्टी के युवा नेता रविकांत का कहना है, “पार्टी अब एक विचारधारा के साथ आगे बढ़ रही है। ये विचारधार अखिलेश युग की शुरुआत है। आने वाले साल अखिलेश के हैं। यूपी चुनाव 2017 अखिलेश की सफलता की पहली सीढ़ी भी है। अगर इन चुनावों में अखिलेश का करिश्मा चलता है तो वो नॉर्दन इंडिया के सबसे बड़े नेताओं में आ जाएंगे। मुलायम सिंह यादव का सभी लोग सम्मान करते हैं। वो हमेशा रहेगा। पार्टी उन्हीं की है और उन्हीं की रहेगी। अखिलेश यादव भी इस बात को मानते हैं। वर्ना वो सिंबल मिलने के बाद मुलायम जी के पास आशीर्वाद लेने के लिए नहीं जाते।”

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चुनाव आयोग द्वारा समाजवादी पार्टी के सिंबल, नाम और अध्यक्ष पद को लेकर अखिलेश के पक्ष में निर्णय देने के बाद उनकी तरफ से जो पहला बयान आया, वह गौर करने वाला है। अखिलेश यादव ने कहा- ‘मैं इस जीत से खुश नहीं, मगर ये लड़ाई जरूरी थी। वह मेरे पिता हैं और मेरे लिए हमेशा ही आदरणीय हैं।’ चुनाव आयोग का फैसला आने के बाद अखिलेश यादव अपनी पत्नी सांसद डिंपल यादव के साथ उनसे मिलने पहुंचे और आशीर्वाद लिया। यह उनकी उदारता के साथ साथ उनके आदर्श पुत्र होने का भी संकेत देता है।

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