समाजवाद का आधार समानता पर आधारित समाज है। 

जहां कोई भेदभाव नहीं हैं। इस विचार की तारीफ तो सभी करते हैं, पर अमल करके दिखा रही हैं आगरा की शहनाज। गरीब बच्चों को शिक्षित करना सबसे बड़ी इबादत है, अध्यापक के लिए छात्र की कोई जाति या धर्म नहीं होता। ऐसी ही सोच को आगे बढ़ाने के मकसद से मोहब्बत के शहर आगरा साम्प्रदायिक सौहार्द की मिसाल बनी हंै शहनाज। यहां के शाहगंज में मुस्लिम महिला शहनाज ने गैर मुस्लिम गरीब बच्चों को शिक्षा देने का नेक काम शुरू किया है। आगरा के शाहगंज में रहने वाली 45 वर्षीय शहनाज की चार बेटियां और एक बेटा है। वह खुद नौवीं तक ही पढ़ी हुई हैं। कम पढ़ी-लिखी होने के बावजूद उनके फौलादी इरादों पर कोई मजहबी दीवार आड़े नहीं आई। 

शहनाज का परिवार हिन्दू बहुल इलाके में रहता है, जहां आसपास गरीब रहते हैं। उन्होंने अपने आस-पड़ोस के गरीब बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी उठाई है। शहनाज का घर पांच कमरों का है, लेकिन यह सप्ताह में छह दिन सुबह 11 बजे से शाम सात बजे तक स्कूल में तब्दील हो जाता है। घर में चलने वाले इस स्कूल में हिंदी, इंग्लिश और उर्दू पढ़ाई जाती है। आज इस स्कूल में आसपास के लगभग 200 बच्चे पढ़ाई करते हैं। ये बच्चे कई सत्र में शाम तक पढ़ते हैं। आज उनके यहां पढ़ने आने वाले छात्र उनको मेरी स्कूल वाली आंटी कहकर बुलाते हैं। शहनाज बताती हैं कि पढ़ने आने वाले बच्चों के माता-पिता के पास पर्याप्त पैसा नहीं है। इसलिए वह छात्रों से कोई शुल्क नहीं लेतीं। शहनाज ने एक वर्ष पूर्व से पढ़ाना शुरू किया है। शुरुआत के तीन महीनों में में लगभग 90 बच्चे आए थे, लेकिन अब 200 बच्चे रोज पढ़ने आते हैं। मेरे लिए बच्चों को पढ़ाना पांच समय की इबादत की तरह है।